बिहार यात्रा: भाग दो, बिहार के ब्लैक एंड व्हाइट के बीच वह ग्रे हिस्सा जिसमें कोसी, सीमांचल, बाढ़ और पलायन आता है

हम लाख यत्नों के बाद भी बाढ़ प्रभावित लोगों की मुश्किलों का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं लगा सकते हैं. कोसी की बाढ़ अन्य नदियों की बाढ़ से कहीं अलग, विकराल और भयावह नजर आती है. ये सिर्फ कुछ गांवों, कुछ लोगों और उनके कुछ समय से छेड़छाड़ नहीं करती है. बल्कि हजारों-लाखों लोगों की कई पीढ़ियों को तबाह कर देती है. 


बिहार पहुंचने के बाद अब हमें इसके भीतर की ख़ाक छाननी है. अभी फिलहाल हमारा पहला लक्ष्य उत्तरी बिहार यानी सीमांचल और मिथिलांचल है. इसमें साथ देने के लिए दो लोग और शामिल हैं. पहले भैया और दूसरी अल्बर्टो. अल्बर्टो के साथ यह हमारा पहला बड़ा सफर है. इसके लिए वह कितनी तैयार है, नहीं मालूम. लेकिन, हमने इसकी पूरी तैयारी कर ली है. गोपालदास नीरज की लिखी पंक्ति, ‘जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा’ को ध्यान में रखते हुए हमने सिर्फ 2 जोड़ी कपड़े अपने बैग में रखे और रवाना हो लिये.

हमें यहां से अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए भारत के पूर्वी-पश्चिमी कॉरिडोर के एक हिस्से(एनएच 57) से होकर जाना है. एनएच पहुंचने के लिए हमारे पास दो रास्ते हैं, एक लम्बा और एक शॉर्टकट. हमने शॉर्टकट चुना. इसकी दो वजह हैं, पहला तो ये हमारी दूरी कम कर रहा है. दूसरा, यह कोसी शाखा नहर के समानांतर होकर जाता है. जिसमें नवंबर की सुहानी सुबह का लुत्फ भी उठाया जा सकता है. हम सही थे, पीछे से आती सूरज की रोशनी नहर के पानी में पड़कर भीतर तक रोमांचित कर देने वाली थी.


अभी कुछ दूर ही निकले होंगे कि भेड़ों का एक बड़ा झुंड नहर पार करके हमारे रास्ते की तरफ बढ़ता दिखा. यह घुमावदार सींगों वाली भेड़ों का एक विशाल झुंड था. जिसे कई चरवाहे मिलकर हांक रहे थे. अपने सिर लगभग जमीन तक गड़ाए सभी भेड़ें एक-दूसरे का अनुसरण करती चली आ रही थीं. नहर पार करते समय उनके ऊनी रोंए भीग गये थे. जिसे झाड़ने के लिए वे अमूमन तेज कंपकपी जैसी हरकत कर रही थीं. रास्ते में मिलने वाले ऐसे तमाम मनोहर दृश्य सफर को उबाऊ होने से बचा लेते हैं. चूंकि हमारी मंजिल अभी दूर थी, हमने भेड़ों को अलविदा कहा और आगे बढ़ गये.

करीब 15 किलोमीटर की दूरी और तय करने के बाद हमने इस सुंदर रास्ते से भी विदा ली और बाएं मुड़ गए. यहां से कुछ दूरी पर अररिया जिले का एक प्रखंड नरपतगंज मिला. इसने हमें नेशनल हाइवे से मिला दिया. अब हम एक चौड़े-सपाट रास्ते में चलने जा रहे हैं. जहां कई गाड़ियां रेलगाड़ी से भी तेज दौड़ती हैं. भर्र-भर्र की आवाज करती दूसरी गाड़ियों के बीच हमारी अल्बर्टो ने भी रप्तार पकड़ ली. अब हम अगले एक घंटे में कम से कम 50 किलोमीटर की दूरी तय कर लेना चाहते हैं.


नेशनल हाइवे में मिनट वाली सुई ने एक चक्कर पूरा कर लिया. अब सूरज हमारे सिर के ऊपर था. उसकी चमक लगातार बढ़ रही थी और उसी अनुपात में गर्मी भी. लेकिन, बिहार देखने-समझने के लिए मेरी आंखों में पैदा हुई चमक के आगे यह फीकी पड़ रही थी. अल्बर्टो भी अपनी तेज रफ्तार से कोई समझौता करने को नहीं तैयार थी. हम चलते गए.


करीब 70 किलोमीटर की दूरी तय कर लेने के बाद हम कोसी के किनारे थे. यहां से कुछ दूरी पर कोसी महासेतु मिला. करीब 2 किलोमीटर लंबा यह पुल अपने ‘महा’ उपसर्ग की जरूरत पर जोर दे रहा था. हमने इत्मीनान से पुल पार किया और कुछ देर सुस्ताने के लिए रुक गए.

यहां भैया ने अपनी बायीं ओर इशारा किया. उनका इशारा बोढ़ा पंचायत की ओर है. जिसके अंदर आने वाले कुछ गांवों को कोसी लील चुकी और अधछका पेट लिए कुछ को लीलने की तैयारी में है.

इन गांवो में रहने वाले लोगों की कमाई का मुख्य जरिया दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करना है. लेकिन कोविड महामारी के चलते हुए लॉकडाउन में वे सभी जैसे-तैसे गांव वापस लौटे थे. यहां ज्यादातर दिनों में उनके पास कोई काम नहीं था. नतीजन कर्ज लद गया और उन्हें महामारी के बीच ही वापस काम की तलाश में फिर लौटना पड़ा. काम मिल गया, लगा कि जल्द ही सबकुछ वापस पटरी पर लौट आएगा. तभी उनके घर से फोन आया कि कोसी का पानी ऊपर चढ़ रहा है. कटान शुरू हो गयी है. ऐसे में उनके पास परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए घर वापस लौटने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था. अब तक हम काफी सुस्ता चुके थे. हम आगे बढ़ गये, ऐसी ही कुछ और कहानियों की तलाश मे.

धूप काफी बढ़ चुकी थी. आमतौर पर अक्टूबर के अंतिम दिनों में इतने कड़ाके की धूप कम ही होती है. हमारी प्यास बढ़ रही थी. इसके लिए अल्बर्टो ने पानी की एक बोतल संभालकर रखी थी. हमने पानी पिया, गूगल मैप पर रास्ता देखा और फिर रवाना हो गये. रास्ते भर चुनाव प्रचार की गाड़ियां तेज आवाज में नारे और गाने बजाते, झंडे लहराते निकल रही थीं. अब तक मिनट वाली सुई ने 3 चक्कर पूरे कर लिए थे. इसके साथ ही हमारी एनएच की यात्रा भी पूरी हो गयी. अब हम भुतहा चौक पर थे. जहां से हमें बाएं मुड़ना है और सीधे चलते जाना है, अपनी कहानी के पास.

हम कुछ ही आगे बढ़े होंगे कि खाकी वर्दी और डंडे के साथ कुछ सिपाही और आसपास कुछ गाड़ियां नजर आयीं. जिनकी ताक-झांक की जा रही थी. यह सब थोड़ा अजीब था. आमतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में पुलिस, ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर सबसे पीछे दिखती है. हम कुछ और सोचते इससे पहले ही एक सिपाही आया. पहले तो उसने अपनी उल्लू जैसी आंखों से अल्बर्टो को स्कैन किया. फिर एक डेली रुटीन डायरी में हमारा नाम, पता और आखिरी पड़ाव दर्ज कराने को कहा. हमने जैसे ही अपना पता फारबिसगंज बताया वह चौंक गया. उसका मुंह तब और देखने लायक था, जब हमने अपनी मंजिल बसीपट्टी बतायी. पुलिसिया मुस्तैदी बिहार चुनाव का असर है. सारी औपचारिकताएं निभाकर हम आगे बढ़ गये.


अब रास्ते में किसी भी तरह का चुनावी शोर नहीं था. यहां हमारा साथ देने के लिए सड़क के दोनों किनारों पर सिर्फ बांस और केले के पेड़ थे. हम डेस्टिनेशन से करीब एक किलोमीटर दूर ही रहे होंगे, तभी हमने देखा कि आगे कोई रास्ता ही नहीं है. सड़क की जगह तालाब था, जिसका पानी सूख जाने से अब कीचड़ बचा है. परेशान करने वाली बात यह थी कि गूगल यहां रास्ता दिखा रहा था. हमारी समझ इसके आगे साथ देने से इनकार करने लगी. तब हमने स्थानीय लोगों का सहारा लिया. उन्होंने बताया कि रास्ता था, जो बाढ़ में बह गया है. गूगल इस बात से बेखबर था.

हमने दूसरा रास्ता पकड़ा, जिसने हमारी तय दूरी को करीब दस किलोमीटर लंबा खींच दिया. यहां हमें दोनों किनारों पर तबाह फसलें, खेतों में भरा पानी और कीड़े चुनते कुछ बगुले दिखे. इस रास्ते पर करीब 12 किलोमीटर चलने के बाद बांस और टिनशेड की मदद से बने कुछ घर दिखे. उनके दरवाजों  के बाहर कुछ नाउम्मीद बूढ़े चेहरे. अब हम मधुबनी जिले के बसीपट्टी गांव में थे. हमारी अल्बर्टो एक नाउम्मीद अनुभवी चेहरे रामवल्लभ मंडल के सामने जाकर रुकी, जिन्होंने अपने जीवन में कई छोटी-बड़ी बाढ़ त्रासदियां झेली थीं. उन्होंने बताया कि कैसे 1999 में आयी बाढ़ में उनके अपने खेत और घर बह गये थे. जिन पर वे दोबारा पैर भी नहीं रख सके. जहां पर कभी उनके घर और खेत हुआ करते थे. वहां अब कोसी की क्रूर धारा बह रही है. उन्हें उम्मीद थी कि सरकार उनकी कोई मदद करेगी. लेकिन  जैसे-जैसे समय बीतता गया उम्मीद के आगे ‘ना’ उपसर्ग जुड़ा और मजबूत होता चला गया.


कहानी इतनी भर नहीं है. रामवल्लभ मंडल की ही तरह 1999 में सैकड़ों परिवारों ने एक झटके में अपने घर और खेत खो दिए थे. उन्हें अभी तक ना तो इसके एवज में किसी तरह का मुआवजा मिला है, ना ही आगे इसकी कोई उम्मीद नजर आती है. अभी जहां पर(सुरक्षा बांध) ये लोग रह रहे हैं, वो भी खुद की खरीदी जमीन है. कभी अपने ही खेतों में अनाज उगाकर खाने वाले इन परिवारों के लोग अगर पलायन का सहारा न लें तो भूखों मरने की नौबत भी आ सकती है. कोविड 19 महामारी के चलते हुए लॉकडाउन के दौरान इस गांव के सभी मजदूर दूसरे राज्यों से किसी तरह वापस लौटे थे. वापस लौटे मजदूरों को काम देने के सरकारी वादों के उलट यहां उनके पास कोई काम नहीं था. वे कर्ज लेकर घर के खर्च पूरे करते रहे. जैसे ही मौका मिला, अपनी जान की परवाह किए बगैर सभी दूसरे राज्यों में काम की तलाश पर निकल गये हैं.


पास ही खड़े सत्तो मंडल(उम्र 60) बताते हैं कि “अब ये जगह भी बरसात के महीनों में बहुत सुरक्षित जगह नहीं रह गयी है. बाढ़ के दिनों में कोसी की धारा, गांव के किनारे बसे घरों तक पहुंच जाती है.” अपनी क्रूरता के लिए जानी जाने वाली कोसी नदी उन्हें कभी भी दोबारा बेघर कर सकती है.

हम लाख यत्नों के बाद भी बाढ़ प्रभावित लोगों की मुश्किलों का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं लगा सकते हैं. कोसी की बाढ़ अन्य नदियों की बाढ़ से कहीं अलग, विकराल और भयावह नजर आती है. ये सिर्फ कुछ गावों, कुछ लोगों और उनके कुछ समय से छेड़छाड़ नहीं करती है. बल्कि हजारों-लाखों लोगों की कई पीढ़ियों को तबाह कर देती है.

यात्रा ज़ारी है...



मैं जवाहर नवोदय विद्यालय और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय का विद्यार्थी रहा हूँ. पत्रकारिता की यात्रा आरंभ की है.